लघुकथा

कॉलेज का आख़री दिन

 पिता जी अक्सर कहा करते थे - " There is an end to everything " या'नी हर चीज़ एक दिन ख़त्म हो जाती है। 
 आज कॉलेज का आख़री दिन था। तीन सालों तक लगातार इसी इमारत में रोज़ आना , दिन के ५ - ६ घंटे यहां गुज़ारना। 
 गुरुजन , सहपाठी , कॉलेज स्टाफ , मौज मस्ती सब कुछ आँखों के सामने तैर रहा था। 
 कुछ खिलखिला रहे थे तो कुछ उदास ग़मगीन बैठे थे। कुछ को बिछड़ने का ग़म था तो कुछ 

नए आसमान  तलाश कर रहे थे। धूप ढल रही थी और मैं सीढ़ियों पर बैठा था। धीरे धीरे कॉलेज में सन्नाटा पसरने  लगा। मैं भारी  मन से उठा और कॉलेज के मेन गेट की ओर बढ़ने लगा।
 वॉचमन की आँखों को पढ़ते हुए मैंने  एक सौ रूपये का नोट उसके हाथ में सरका  दिया। वॉचमन ने फौजी अंदाज़ में मुझे पहला और आख़री  सैलूट मारा  
 लेकिन मेरा ध्यान Bruno की तरफ था जिसने मुझे देखते ही अपनी पूछ हिलानी शुरू कर दी थी।
 मैंने चाय की ढपरी से बिस्कुट का पैकेट ख़रीदा  और Bruno को खिलाने लगा लेकिन आज Bruno ने बिस्कुट नहीं खाये। कुछ देर मेरे क़रीब बैठा रहा , 
 रह रह कर मेरे उदास चेहरे को ताकता और मेरी टाँगो से लिपट जाता। 

गगन में चाँद निकला  तो मैं बमुश्किल वहाँ से उठा , Bruno को सहलाया और अँधेरे में गुम हो गया। 

- इन्दुकांत आंगिरस ©