कविता
ज़रूरत
इस अँधेरे शहर में कोई भी नहीं जलाता अपना घर , तंग सीलन भरी बीमार गलियों की साँसें मजबूर हैं अपने ही क़दमों के नीचे दबी ज़मीन से बहुत दूर हैं इन अँधेरी गलियों में ज़रूरत , किसी सूरज की नहीं है ज़रूरत सिर्फ मिटटी के एक दिए की है जो हमारे आस - पास ही यही कहीं है ज़रूरत है सिर्फ उस मासूम मुस्कान की जो अपने ही घर में आग लगाने से बेसाख़्ता आ ही जाती है जो अपना सब कुछ लुटा कर भी किसी न किस के काम आ ही जाती है लेकिन इस अँधेरे शहर में कोई भी नहीं जलाता अपना घर।