गीत

एक टूटी बांसुरी सी जब रो रही थी ज़िंदगी

 
	
एक टूटी बाँसुरी सी जब रो रही थी ज़िंदगी 

साज़ सब टूटे हुए थे , गीत सब रूठे हुए थे 



तुम से मिल कर यूँ लगा , हाँ तुम से मिल कर यूँ लगा 

जैसे दिल को इक तराना ज़िंदगी का मिल गया 



लाज के पहरे कड़े थे , नैन पर घूँघट पड़े थे 

भूल से नज़रे मिला दी , हँस पड़ी वो खिलखिला दी 



तुम से मिल कर यूँ लगा , हाँ तुम से मिल कर यूँ लगा 

जैसे दिल को इक बहाना दिल लगी का मिल गया 



कोई जादू था नज़र का , रास्ता भूला मैं घर का 

एक ख़ुश्बू सी उठी फिर , छाई मस्ती हर तरफ़ फिर 



तुम से मिल कर यूँ लगा , हाँ तुम से मिल कर यूँ लगा 

जैसे दिल को इक ज़माना आशिक़ी का मिल गया 



बुझ चुका  था हर चिराग़ , राख़ में भी थी न आग 

हर क़दम पर फ़ासले थे, आँसुओं के क़ाफ़िले थे  



तुम से मिल कर यूँ लगा , हाँ तुम से मिल कर यूँ लगा 

जैसे दिल को इक फ़साना रौशनी का मिल गया 



हर तरफ़ तन्हाइयाँ थी , ग़म की ही परछाइयाँ  थी 

मेरे दिल में यूँ तू आया , ज़र्रा ज़र्रा मुस्कुराया 



तुम से मिल कर यूँ लगा , हाँ तुम से मिल कर यूँ लगा 

जैसे दिल को इक ख़ज़ाना ज़िंदगी का मिल गया  



कवि - इन्दुकांत आंगिरस ©