ग़ज़ल

तीरगी का सफ़र , इक परी चाहिए

तीरगी का सफ़र , इक परी  चाहिए 

जगमगाती   हुई ,  रौशनी  चाहिए 



दोस्ती भी भली , दुश्मनी भी भली 

हम फकीरों को बस , बंदगी चाहिए 



फूल बन कर खिलूँ  , मैं हरिक साँस में

साँस को   प्रेम की ,   रागिनी चाहिए 



बात सुनने में लगती है कैसी अजब 

ज़िंदगी के लिए  ,  ज़िंदगी चाहिए  



भीड़ है तो ख़ुदाओं कि हर सू  मगर 

आदमी को यहाँ  ,आदमी  चाहिए  



उठ रहा है धुआं , हर नज़र से यहाँ 

हर नज़र को मगर,  चाँदनी चाहिए 



नफ़रतों को मिटा , दे जो दिल से ' रसिक  '

आज दिल   को वही  , सादगी चाहिए